इतिहास बदलने और दोहराने से इतिहास बनाने और चूक जाने तक: चीन, चिली, सूडान और कॉप-26

तिहास भी अजीब चीज है. भूत की तरह दुनिया का पीछा करता और डराता रहता है.

मशहूर उपन्यासकार जार्ज आर्वेल के उपन्यास ‘1984’ में एक पात्र विंस्टन कहता है, “जो अतीत (इतिहास) पर नियंत्रण रखता है, वह भविष्य को नियंत्रित करता है: जो वर्तमान पर नियंत्रण रखता है, वह इतिहास को नियंत्रित करता है.”

इन दिनों दुनिया के कई देशों में इतिहास पर कब्जे को लेकर मारामारी जारी है. उत्तर सत्य (पोस्ट ट्रुथ) दुनिया में यह मारामारी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है जहाँ तथ्यों और सबूतों की जगह भावनाओं, विश्वासों, आस्थाओं और प्रोपेगंडा का बोलबाला बढ़ गया है.

असल में, इतिहास को नियंत्रित करने यानी उसे मनमाने तरीके या अपनी सुविधा के मुताबिक लिखने या व्याख्यायित करने की कोशिशें नई नहीं हैं.

क्या इतिहास की भूलों को दोहराने की ओर बढ़ रहा है चीन?  

चीन को ही लीजिए. इतिहास के मन-मुताबिक इस्तेमाल के बारे में चीन के मौजूदा कम्युनिस्ट नेतृत्व खासकर पार्टी महासचिव और राष्ट्रपति शी जिन-फिंग से बेहतर कौन जानता है जो इन दिनों  चीन के वर्तमान पर नियंत्रण के जरिये इतिहास को और उससे ज्यादा भविष्य को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं.

चीन के राष्ट्रपति शी जिन-पिंग: नज़र इतिहास पर

बीते सप्ताह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति की महत्वपूर्ण बैठक- प्लेनम हुई. इसमें अपनी स्थापना का सौवां साल मना रही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने एक “ऐतिहासिक प्रस्ताव” पारित किया. पार्टी के इतिहास में इस तरह का “ऐतिहासिक प्रस्ताव” इससे पहले सिर्फ दो बार पास किया गया है- पहली बार 1945 में जब पार्टी ने माओ त्से तुंग को सर्वोच्च नेता और उनकी वैचारिक-राजनीतिक लाइन (माओ त्से-तुंग विचारधारा) को स्वीकार कर लिया और दूसरी बार 1981 में जब देंग शियाओ पिंग के नेतृत्व में पार्टी ने माओ के कार्यकाल में हुई गलतियों की आलोचना करते हुए ‘चीनी रंग के समाजवाद’ के तहत अर्थव्यवस्था को आर्थिक सुधारों के लिए खोलने यानी उसे पूंजीवादी रास्ते पर ले जाने की शुरुआत की थी.     

कोई 40 साल बाद पार्टी ने यह तीसरा और खुद उसके मुताबिक ‘ऐतिहासिक’ प्रस्ताव पारित किया है जिसमें मौजूदा महासचिव और राष्ट्रपति शी जिन-फिंग का जमकर महिमामंडन किया गया है और उन्हें आधुनिक चीन के दो सबसे बड़े नेताओं माओ और देंग शियाओ पिंग की कतार में खड़ा करके पार्टी का ‘कोर’ घोषित कर दिया गया है. यही नहीं, इस प्रस्ताव में पार्टी ने अपने सौ साल के इतिहास की उपलब्धियों का महिमागान करते हुए अपनी गलतियों और भूलों पर पर्दा भी डाल दिया है. 

असल में, यह प्रस्ताव चीन में शी जिन-फिंग के एकछत्र राज पर पार्टी की मुहर भर है. इस प्रस्ताव ने पार्टी, सरकार और चीन की मौजूदा राजनीति में शी के बढ़ते ‘पर्सनालिटी कल्ट’ और सर्व-शक्तिमान नेतृत्व की औपचारिक पुष्टि भर की है. इस प्रस्ताव से यह भी साफ़ हो गया है कि शी को अगले साल के उत्तरार्द्ध में होनेवाली पार्टी कांग्रेस में अगले पांच साल के लिए एक और कार्यकाल मिलना तय है जो उनका तीसरा कार्यकाल होगा.

शी ने देंग के कार्यकाल में बने उस नियम को 2018 में ही बदलवा दिया था जिसमें पार्टी में सामूहिक नेतृत्व को आगे बढ़ाने और ‘पर्सनालिटी कल्ट’ पर अंकुश लगाने के लिए पार्टी महासचिव और राष्ट्रपति के कार्यकाल को अधिकतम सिर्फ दो कार्यकाल देने की व्यवस्था थी.

इस प्रस्ताव के जरिये शी खुद को माओ और देंग की कड़ी में रखकर न सिर्फ इतिहास लिखने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि इतिहास के सहारे सत्ता पर अपनी पकड़ को और मजबूत बनाने और उसे एक ऐतिहासिक वैधता देने की कोशिश कर रहे हैं.

यह प्रस्ताव कहता है कि माओ का कार्यकाल चीनी जनता के लिए सदियों के विदेशी उत्पीड़न और अपमान के खिलाफ़ खड़े होने का था जबकि देंग के कार्यकाल में चीन आर्थिक सुधारों के जरिये सदियों की ग़रीबी को मिटाने और अमीर बनने की राह पर बढ़ा और अब उन्हीं उपलब्धियों के बल पर चीन शी के नेतृत्व में एक ‘नए युग’ में प्रवेश कर रहा है जहाँ वह खुद को ताकतवर और दुनिया की एक बड़ी महाशक्ति बनने की राह पर बढ़ चला है.

दरअसल, इसके जरिये शी चीनी जनता को यह सन्देश देना चाहते हैं कि चीन को एक ‘नए युग’ में ले जाने और महाशक्ति बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए उनका नेतृत्व न सिर्फ माओ और देंग की तरह युगांतकारी है बल्कि उतना ही अपरिहार्य है. इस तरह शी कह रहे हैं कि चीन के पास उनका कोई विकल्प नहीं है. आश्चर्य नहीं कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी “नए युग में चीनी रंग-ढंग के समाजवाद के लिए शी जिन-फिंग विचार” को उसी तरह स्वीकार कर लिया है जिस तरह किसी ज़माने में माओ त्से-तुंग विचार को स्वीकार किया था.                  

वैसे तो कम्युनिस्ट पार्टियाँ दावा करती हैं कि उनके लिए विचारधारा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और वे व्यक्ति/नेता को कोई खास महत्त्व नहीं देती हैं. वे खुद को ‘पर्सनालिटी कल्ट’ के खिलाफ बताती हैं. दूसरे, उनका यह भी दावा रहा है कि किसी एक नेता के बजाय वे सामूहिक नेतृत्व (कम्युनिस्ट शब्दावली में ‘जनवादी केन्द्रीयता’) में विश्वास करते हैं.

लेकिन दुनिया भर में कम्युनिस्ट पार्टियों के इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहाँ विचारधारा को परे रखकर और कई बार विचारधारा से भी कई पायदान ऊपर नेताओं और ‘पर्सनालिटी कल्ट’ को स्थापित करने की कोशिश की गई है. ज्यादातर मामलों में यह ‘पर्सनालिटी कल्ट’ कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए बहुत भारी साबित हुआ है और उन देशों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी है जहाँ ये कम्युनिस्ट पार्टियाँ कभी सत्ता में रही हैं. अनेकों मामलों में कम्युनिस्ट पार्टियों के राज में ‘सर्वहारा की तानाशाही’ व्यवहार में, नेताओं की तानाशाही में बदल गई.

चीन की सौ साल की हो गई कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास भी इसका अपवाद नहीं है. चीनी क्रांति के नेता माओ त्से-तुंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में ‘पर्सनालिटी कल्ट’ के सबसे बड़े उदाहरण हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि माओ आधुनिक चीन के निर्माताओं में हैं. लेकिन पार्टी और सरकार में उनका कद और प्रभाव एक दौर में इतना अधिक बढ़ गया कि जनवाद पीछे चला गया और अति-केन्द्रीयता हावी हो गई. इस कारण अनेकों गलत, मनमाने और अतिरेकपूर्ण फैसले हुए जिसकी कीमत लोगों को चुकानी पड़ी.

वैसे तो कम्युनिस्ट पार्टियाँ इतिहास से सबक लेने के साथ इतिहास न दोहराने के दावे भी करती रही हैं. इसके बावजूद वे ‘ऐतिहासिक गलतियाँ’ करने की भी आदी रही हैं. हालाँकि यह फैसला आनेवाला इतिहास करेगा. लेकिन ऐसा लगता है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी शी के नेतृत्व में पर्सनालिटी कल्ट को आगे बढ़ाकर और सामूहिक नेतृत्व के बजाय एक नेता के हाथ में सारी ताकत देकर एक बार फिर ‘ऐतिहासिक गलती’ करने की ओर बढ़ चली है.  

क्या चिली में इतिहास करवट लेगा?

इधर, चीन में शी इतिहास पर नियंत्रण के जरिये सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं. उधर, सुदूर दक्षिणी अमेरिकी देश चिली में इतिहास करवट ले रहा है. यहाँ राष्ट्रपति चुनाव की गर्मी अपने चरम पर पहुँच गई है. इस रविवार (21 नवम्बर) को वोट पड़ेंगे जिसमें यह तय होगा कि देश किस रास्ते जाएगा? चिली 48 साल बाद एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ से वह एक बार फिर वामपंथी राह ले सकता है या फिर धुर दक्षिणपंथी खासकर ब्राजील के जाईर बोल्सानारो की तर्ज के नेता और सैन्य तानाशाह जनरल पिनोशे के भक्त की वापसी हो सकती है.

चिली में राष्ट्रपति चुनाव 21 नवंबर को

याद रहे कि चिली वह देश है जहाँ 1973 में अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी- सी.आई.ए की खुली मदद से जनरल पिनोशे ने तत्कालीन राष्ट्रपति सल्वादोर अलेंदे की चुनी हुई लोकप्रिय वामपंथी सरकार को सैन्य तख्तापलट से हटाकर सैन्य तानाशाही कायम की थी. चिली और दुनिया के इतिहास में वह एक और 9/11 के रूप में याद किया जाता है जब 11 सितम्बर 1973 को अलेंदे की हत्या और खूनी सैन्य तख्तापलट के बाद जनरल पिनोशे की तानाशाही में चिली पहला देश था जहाँ विश्व बैंक-मुद्रा कोष निर्देशित वाशिंगटन सहमति के तहत नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को थोपा गया था.

लेकिन 1988-90 में जनरल पिनोशे की सैन्य तानाशाही के अंत और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की बहाली के बाद लोआ, बेकर और बिओ-बिओ में बहुत पानी बह चुका है. इन तीस सालों में देश की राजनीति में मोटे तौर पर नव उदारवादी मध्यमार्गी और दक्षिणपंथी पार्टियों और नेताओं का दबदबा बना रहा है. पिनोशे के दौर की नव उदारवादी आर्थिक नीतियाँ भी कमोबेश जारी रही हैं. यहाँ तक कि पिनोशे के जाने के बाद कई संशोधनों के बावजूद 1980 का चिली का संविधान मूलतः सैन्य तानाशाही के दौर का ही है.

चिली कई मामलों में खास है. उसे दुनिया और खासकर दक्षिण अमेरिका में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के चमकते उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है. वह दुनिया के अमीर देशों के संगठन- ओ.ई.सी.डी का सदस्य है. लेकिन नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और दक्षिणपंथी सरकारों की अगुवाई में तेज विकास दर और आर्थिक समृद्धि के बावजूद देश में गैर बराबरी बेतहाशा बढ़ी है. दक्षिण अमेरिका में चिली उन चुनिंदा देशों में है जहाँ आर्थिक समृद्धि के बीच गैर बराबरी और विषमता चरम पर है.

यही नहीं, देश में शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार भी एक बड़ा मुद्दा है. मौजूदा राष्ट्रपति सेबेस्टियन पिनेरा खुद अरबपति हैं और दक्षिण अमेरिकी देशों के उन चुनिंदा राष्ट्राध्यक्षों में हैं जिनका नाम पैंडोरा पेपर्स में आया है. इस खोजी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पिनेरा और उनके परिवार के सदस्यों ने 2010 में चिली की एक माइनिंग कंपनी की बिक्री में ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड में पैसे लिए और उस कंपनी को पर्यावरण संबंधी जरूरतों से बाहर रखने में मदद की.

पिछले सप्ताह ठीक चुनावों की गर्मी के बीच चिली की संसद के निचले सदन ने लम्बी और ड्रामे से भरी बहस के बाद महाभियोग शुरू करने का प्रस्ताव पास कर दिया. इस बहस में महाभियोग के पक्ष में संसद जैमी नारान्जो ने 13 घंटे लम्बा भाषण दिया और इस दौरान कोई 1300 पृष्ठ लम्बा अभियोगपत्र पेश किया. हालाँकि उच्च सदन में यह प्रस्ताव गिर गया है लेकिन इसने देश में भ्रष्टाचार के मुद्दे को गर्म जरूर कर दिया है.   

यहाँ यह याद दिलाना भी जरूरी है कि चिली की राजनीति में वाम की वापसी की जमीन पिछले डेढ़ दशकों में आन्दोलनों और विरोध प्रदर्शनों खासकर छात्र-नौजवानों के आन्दोलनों के तीन बड़े उभारों से बनी है. सबसे पहले वर्ष 2006 में एक नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति और पाठ्यक्रम, स्कूल-कालेज फ़ीस और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के किरायों में कमी आदि मुद्दों को लेकर छात्रों-युवाओं के आन्दोलन की शुरुआत हुई. छात्रों के काले और सफ़ेद यूनिफार्म के कारण पेंगुइन क्रांति के नाम से मशहूर इस आन्दोलन ने चिली में नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को कठघरे में खड़ा कर दिया.

चिली में विरोध प्रदर्शनों ने नया इतिहास लिखा है

इसके बाद इन्हीं मांगों को लेकर एक बार फिर 2011-13 के बीच छात्र-युवा आन्दोलनों की लहर ने चिली की राजनीति और समाज को हिला कर रख दिया. इस आन्दोलन ने देश में वामपंथी राजनीति और एक्टिविज्म में एक नई जान फूंक दी. मौजूदा राष्ट्रपति चुनावों में एक व्यापक वाम गठबंधन के उम्मीदवार गाब्रिएल बोरिच इसी छात्र आन्दोलन के नेता रहे हैं और जो 2014 में संसद के निचले सदन के लिए चुने गए.

छात्र आन्दोलनों की तीसरी लहर अक्तूबर 2019 में पब्लिक ट्रांसपोर्ट किरायों में बढ़ोत्तरी के बाद शुरू हुई जिसे पिनेरा सरकार ने पुलिस और सेना के बल पर दबाने की कोशिश की. दर्जनों आंदोलनकारी मारे गए. इस आन्दोलन ने चिली की राजनीति की धुरी को थोड़ा और वामपंथ की ओर झुका दिया. इस आन्दोलन की ताकत के आगे पिनेरा की सरकार को झुकना पड़ा और आन्दोलनकारियों की मांग के मुताबिक चिली के नए संविधान के लिए 2020 में जनमत-संग्रह हुआ जिसमें लोगों ने बहुमत से पिनोशे काल के संविधान को रद्द करके नए संविधान के निर्माण के लिए वोट दिया.

निश्चय ही, यह एक ऐतिहासिक जनादेश और चिली की राजनीति में बड़ा मोड़ था. यह प्रक्रिया इस साल मई में नई संविधान सभा के 155 सदस्यों के लिए हुए चुनावों में वाम और प्रगतिशील प्रतिनिधियों की उल्लेखनीय जीत के साथ और आगे बढ़ी है. हालाँकि संविधान सभा अपना काम शुरू कर चुकी है लेकिन चिली की राजनीति में धुर दक्षिणपंथी और पिनोशेवादी न सिर्फ गोलबंद होने लगे हैं बल्कि लोगों खासकर अमीरों, उच्च और शहरी मध्यमवर्ग में वामपंथ, देशज (इंडिजिनस) और आप्रवासी समूहों का भय पैदा करके उन्हें इकठ्ठा करने में जुट गए हैं.  

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार: बोरिच, प्रोवोस्त, कास्ट और सिचेल (क्लाकवाइज)

हालाँकि इस सप्ताह होने जा रहे आम चुनावों में कई प्रत्याशी मैदान में हैं लेकिन मुख्य मुकाबला वाम-लोकतान्त्रिक गठबंधन के उम्मीदवार गाब्रियल बोरिच और रिपब्लिकन उम्मीदवार जोस अंतोनियो कास्ट के बीच है. बोरिच का वाम गठबंधन चिली को एक “समाजवादी, लोकतान्त्रिक, उदारवादी और नारीवादी समाज” में बदलने के वायदे के साथ मैदान में है.

दूसरी ओर, बिलकुल डोनाल्ड ट्रंप और जाईर बोल्सनारो की तर्ज पर चिली की राजनीति में उभरे अरबपति उद्योगपति जोस कास्ट धुर दक्षिणपंथी समूहों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो महिला अधिकारों, प्रवासियों और देशज समूहों का खुलकर विरोध करते हैं, पिनोशे के समर्थन में बोलते हैं, नव उदारवादी अर्थनीति के पैरोकार हैं और क्लाइमेट चेंज को नकारते हैं. ट्रंप की तर्ज पर कास्ट आप्रवासियों को देश में आने से रोकने के लिए चिली की सीमाओं पर गड्ढे खोदने की वकालत करते हैं.    

मुकाबला कड़ा है. चुनाव प्रचार के शुरुआत से ओपिनियन पोल्स में वाम उम्मीदवार बोरिच आगे चल रहे थे. लेकिन पिछले बीते सप्ताहों में कुछ ओपिनियन पोल्स में कास्ट ने मामूली सी बढ़त बनाई है. इसके बावजूद ज्यादा सम्भावना यह है कि इस चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को जरूरी 50 फीसदी वोट नहीं मिलेगा. उस स्थिति में महीने भर बाद दिसम्बर में रन-अप चुनावों से चिली अपनी आगे की राह तय करेगा.          .                   

कहा जा रहा है कि चिली में पैदा हुए नव उदारवाद की कब्र भी चिली में ही खुदेगी. इतिहास के इस करवट को देखने के लिए दुनिया भर की निगाहें चिली की ओर लगी हुई हैं.

इतिहास नहीं बना पाया ग्लासगो

कहा यह भी जा रहा था कि ग्लासगो में कॉप-26 सम्मेलन में एक नया इतिहास बनेगा.

सम्मेलन से पहले खूब हाइप पैदा किया गया. हालाँकि पिछले ढाई दशकों में अब तक हुए कॉप सम्मेलनों के इतिहास को देखते हुए यह उम्मीद कम ही थी कि ग्लासगो में कोई बड़ा, महत्वाकांक्षी और ऐतिहासिक फैसला होगा.

लेकिन नेट जीरो और फासिल फ्यूएल (कोयला-पेट्रोलियम) को फेज आउट करने के शोर-शराबे के बीच एक बार कहा जा रहा था कि यह दुनिया के लिए क्लाइमेट चेंज से निपटने का यह आखिरी मौका है.

बाद में देखेंगे क्लाइमेट जस्टिस

लेकिन ग्लासगो में कोई इतिहास नहीं बना. उलटे पिछले कॉप सम्मेलनों की तरह ग्लासगो में भी इतिहास अपने को दोहराता दिखा जहाँ पर्यावरण को नुकसान पहुँचानेवाली और क्लाइमेट चेंज के लिए जिम्मेदार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के सबसे बड़े आरोपी अमीर-औद्योगिक देश एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुकर गए बल्कि तीन-तिकड़म के जरिये गरीब और विकासशील देशों पर सारी जिम्मेदारी डालने की कोशिश करते रहे.

अमीर औद्योगिक देशों के नेताओं ने हर बार की तरह इस बार भी खूब लच्छेदार भाषण दिए, फोटो खिंचाए और चलते बने.  

अपने अकबर इलाहाबादी बहुत पहले लिख गए हैं:

“क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ

रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ.”

 गरज यह कि जल्दी क्या है? फासिल फ्यूएल समर्थित नेताओं को लगता है कि अभी क्लाइमेट चेंज से निपटने के समय बहुत है. ग्लासगो निपट गया. अब इंतजार कीजिए- कॉप-27 का जो अगले साल मिस्र के खूबसूरत पर्यटक शहर शर्म-अल-शेख में होना है.

चलते-चलते: सूडान में एक और सैन्य तख्तापलट  

आपको यह फोटो याद आ रही है. सूडान की राजधानी खार्तूम में शाम के धुंधलके में इकठ्ठा प्रदर्शनकारियों के बीच सफ़ेद लबादे और सोने के इयर-रिंग पहने एक नौजवान लड़की कार की बोनट पर चढ़कर नारे लगा रही है. यह अला सालाह हैं जो पत्रकार भी हैं.

वे 10 अप्रैल 2019 की उस ऐतिहासिक शाम उन हजारों प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ाने की कोशिश कर रही थीं जो सूडान में पिछले तीस साल से राज कर रहे तानाशाह, जनसंहारों और युद्ध अपराध के आरोपी ओमर अल बशीर को हटाने और लोकतंत्र बहाल करने की मांग कर रहे थे.

वे और हजारों सूडानी नौजवान उस शाम उस “थावरा” (क्रांति) के लिए नारे लगा रही थे जो चाहते हैं कि सूडान में धर्म के नाम पर खून-खराबा और एथनिक जनसंहार बंद हो, सेना बैरकों में वापस लौटे, देश में लोकतंत्र और शांति बहाल हो. यह प्रदर्शन भी उन विरोध प्रदर्शनों की कड़ी में था जो सूडान में 2018 में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और महंगाई के विरोध में शुरू हुए थे.

सेना ने इस ऐतिहासिक “थावरा” को क्रूरता से दबाने की कोशिश की. दर्जनों प्रदर्शनकारी मारे गए. लेकिन इससे आन्दोलन दबा नहीं. आख़िरकार बशीर को जाना पड़ा. लेकिन बशीर को हटाकर सेना ने सत्ता खुद हथिया ली. लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया. विरोध प्रदर्शन जारी रहे और सेना उसे कुचलने की कोशिश करती रही. आख़िरकार मध्यस्थों की मदद से यह समझौता हुआ कि फ़िलहाल दो साल के लिए सेना अंतरिम सरकार चलाये लेकिन 2022 में लोकतान्त्रिक चुनाव करवाके सत्ता नागरिक सरकार को सौंप कर बैरकों में वापस लौट जाए.

लेकिन बीते दिनों सूडान में दो साल के अन्दर एक और सैन्य तख्तापलट ने इतिहास के पहिए को आगे बढ़ने से फिर रोक दिया है. पूर्व सैन्य जनरल और संक्रमणकालीन सरकार की पीछे से बागडोर थामे अब्दल-फत्ता अल-बुरहान को अगले कुछ महीनों में देश की कमान चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार को सौंपनी थी लेकिन लगता है कि उनके मन में कुछ और ही था.

बीते सप्ताह अल-बुरहान ने देश में गृह युद्ध छिड़ने का बहाना बनाते हुए एक सैन्य तख्तापलट के जरिये न सिर्फ सत्ता हथिया ली, सिविलियन प्रधानमंत्री अब्दल्ला हम्डोक को गिरफ्तार कर लिया बल्कि उस समझौते से भी मुकर गए जिसके मुताबिक सेना को इस साल से बैरकों में वापस लौटना और अगले साल लोकतान्त्रिक चुनावों में चुनी हुई नागरिक सरकार को सत्ता सौंपनी थी.

लेकिन इस सैन्य तख्तापलट के खिलाफ एक बार फिर आमलोग सड़कों पर हैं. सुरक्षा बलों की फायरिंग में अनेकों प्रदर्शनकारी मारे गए हैं. इसके बावजूद लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. प्रदर्शनों का दौर जारी है.  

सूडान पर नज़र रखिये. यहाँ “थावरा” एक नया इतिहास बनाने की ओर है.

इस सप्ताह इतना ही. अगले सप्ताह फिर हाजिर होंगे, दुनिया-जहान की कुछ और रिपोर्टें लेकर.

इस बीच, आप अपनी फीडबैक भेजते रहिये.  

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Anand Pradhan

देश-समाज की राजनीति, अर्थतंत्र और मीडिया का अध्येता और टिप्पणीकार