रूस-यूक्रेन युद्ध की मार से लड़खड़ाती वैश्विक अर्थव्यवस्था

रूस-यूक्रेन युद्ध का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था दिखने लगा है. पिछले दो सालों से कोरोना महामारी की मार से पस्त वैश्विक अर्थव्यवस्था में हाल के महीनों में मुद्रास्फीति में उछाल जैसी गंभीर समस्याओं के बावजूद सुधार के संकेत दिख रहे थे लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण उसके एक बार फिर पटरी से उतरने का खतरा बढ़ गया है.

यही नहीं, कोढ़ में ख़ाज की तरह चीन में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों और उससे निपटने के लिए लगाए गए सख्त लाकडाउन से वैश्विक सप्लाई चेन में बाधा, गैस-पेट्रोल की ऊँची कीमतें और कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बेक़ाबू महंगाई दर ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.

आश्चर्य नहीं कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में इस साल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में 4.7 फीसदी की बढ़ोत्तरी के अपने पिछले पूर्वानुमान को डेढ़ फीसदी से ज्यादा घटाकर सिर्फ तीन फीसदी कर दिया है. दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास संगठन (अंकटाड) की हाल में जारी रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर सिर्फ 2.6 फीसदी रहने का अनुमान है जो उसके पिछले पूर्वानुमान 3.6 फीसदी से एक फीसदी कम है.

उधर, विश्व बैंक और आइएमएफ ने भी रूस-यूक्रेन युद्ध को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए कोरोना महामारी के बाद दूसरा बड़ा झटका बताते हुए उसकी रफ़्तार धीमी पड़ने और रूस और यूक्रेन सहित मध्य यूरोप और मध्य, दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया की कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं के मंदी की चपेट में आने की चेतावनी दी है. यही नहीं, युद्ध के कारण खाद्यान्नों खासकर गेहूं और वनस्पति तेलों की कीमतों में तेज उछाल के कारण कई विकासशील और गरीब देशों में श्रीलंका की तरह के हालात पैदा होने की आशंका भी जाहिर की जा रही है.

असल में, रूस और यूक्रेन का कुल वैश्विक व्यापार में हिस्सा कम है लेकिन गेहूं, मक्के और खाद्य तेलों के मामले में वे दुनिया के तीन बड़े निर्यातकों में से हैं. रूस और यूक्रेन अकेले दुनिया का लगभग तीस फीसदी गेहूं निर्यात करते हैं. मध्य पूर्व और उत्तरी और पूर्वी अफ्रीका के कई देश रूस और यूक्रेन से गेहूं आयात पर निर्भर हैं. इसी तरह रूस उर्वरकों में नाइट्रोजन उर्वरक का दुनिया का सबसे बड़ा, पोटैसियम का दूसरा सबसे बड़ा और फास्फोरस खाद का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक है.

लेकिन युद्ध के कारण एक तो काला सागर से व्यापार ठप्प है और दूसरे, पश्चिमी देशों ने रूस पर वित्तीय और व्यापार संबंधी पाबंदियां लगा रखी हैं जिसके कारण गेहूं, खाद्य तेलों और उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित हुई है. नतीजा यह कि युद्ध शुरू होने के बाद सिर्फ एक महीने में वैश्विक बाज़ार में गेहूं की कीमतों में लगभग 20 फीसदी और मक्के की कीमतों में 19 फीसदी की रिकार्डतोड़ उछाल दर्ज की गई है. विश्व खाद्य संगठन (एफएओ) के मुताबिक, मार्च महीने में अनाजों की कीमतों में लगभग 17 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. इसी तरह फ़रवरी के बाद से खाद्य तेलों की कीमतों में भी 25 फीसदी तक की उछाल दर्ज की गई है.

यूक्रेन में गेहूं के खेत: यही यूक्रेन के झंडे का रंग भी है (फोटो: क्रिएटिव कामंस)

जैसे इतना ही काफी न हो, वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के बीच बढ़ती मांग की वजह से पेट्रोलियम और गैस की कीमतों में पहले से ही बढ़ोत्तरी शुरू हो गई थी लेकिन युद्ध ने उसमें आग लगा दी. हालाँकि कच्चे तेल की कीमतें फिलहाल 100 डालर प्रति बैरल के आसपास स्थिर दिख रही हैं लेकिन अब भी यह भी बहुत ज्यादा है. कच्चे तेल और साथ में, अनाजों, खाद्य तेलों की कीमतों में इस तेजी का सीधा असर दुनिया के अधिकांश देशों में बेकाबू हो रही महंगाई दर में दिख रहा है जो अब लगभग सभी उत्पादों और सेवाओं की कीमतों को प्रभावित कर रही है.  

इस रिकार्डतोड़ महंगाई का नकारात्मक असर वस्तुओं और सेवाओं की मांग पर पड़ रहा है क्योंकि लोग उपभोग में कटौती करने को मजबूर हो रहे हैं. दोहराने की जरूरत नहीं है कि मांग में गिरावट का सीधा असर निवेश पर पड़ता है और इस तरह उपभोग-मांग-निवेश पर निर्भर आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार सुस्त पड़ने की आशंका बढ़ जाती है. जाहिर है कि महामारी की मार से मंदी की चपेट में आई उस वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ऊँची मुद्रास्फीति दर कतई अच्छी खबर नहीं है जो टीकाकरण के बाद आर्थिक गतिविधियों के फिर से जोर पकड़ने के कारण पिछले कुछ महीनों से पटरी पर लौटती हुई दिख रही थी.

यही नहीं, आसमान छूती महंगाई खासकर अनाजों, खाद्य तेलों और पेट्रोल-गैस की कीमतें राजनीतिक रूप से भी अत्यधिक ज्वलनशील मुद्दा हैं. अगर रूस-यूक्रेन युद्ध जल्दी नहीं रुका और महंगाई ऐसे ही बेकाबू बढ़ती रही तो श्रीलंका और कज़ाखिस्तान जैसे हालात मध्य-पूर्व और उत्तरी और पूर्वी अफ्रीका के कई देशों में दिख सकते हैं. याद रहे कि 2011 की “अरब क्रांति” के पीछे एक बड़ा कारण महंगाई खासकर अनाजों की कीमतों में वृद्धि भी थी.        

ऐसे में, बढ़ती हुई महंगाई को काबू में करने के लिए दुनिया के अधिकांश देशों में उनकी सरकारों और केन्द्रीय बैंकों पर दबाव है कि वे महामारी के दौरान डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा और मांग-निवेश को बढ़ावा देने के लिए राजकोषीय सहायता में वृद्धि और उदार मौद्रिक नीति को बदलें और राजकोषीय सहायता में कटौती के साथ ब्याज दरें बढ़ाएं. लेकिन मौजूदा स्थिति में जब अर्थव्यवस्थाएं डगमगाई हुई हों और उपभोग-मांग-निवेश पर भारी दबाव हो तो राजकोषीय सहायता में कटौती और मौद्रिक नीति को कसने की कोशिश अर्थव्यवस्थाओं को फिर से पटरी से उतार और यहाँ तक कि मंदी की चपेट में फंसा सकती है.

श्री लंका का आर्थिक संकट

दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों या उभरती हुई अर्थव्यवस्था के मैनेजरों के लिए यह एक गंभीर दुविधा की स्थिति है जिसमें वे यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे रिकार्डतोड़ महंगाई से निपटें या लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को सँभालने की कोशिश करें. उनका अनिर्णय वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भारी पड़ रहा है. लेकिन यह भी सच है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के रुके बिना उनका कोई भी फैसला बहुत प्रभावी नहीं होगा.

दरअसल, युद्ध रोकने के लिए राजनय और कूटनीति को आगे करना होगा जिसकी गंभीर पहल कहीं नहीं दिख रही है. यह वैश्विक नेतृत्व खासकर बड़े और ताकतवर पश्चिमी देशों के नेतृत्व की नाकामी है जो युद्ध रोकने के बजाय उसमें और घी डालने में जुटे हैं.

लेकिन इसकी कीमत आम लोगों के साथ अर्थव्यवस्थाओं को भी चुकानी पड़ रही है. भारत भी इस स्थिति से अछूता नहीं है जहाँ बेकाबू महंगाई रिज़र्व बैंक के उपरी दायरे से भी आगे निकल चुकी है लेकिन औद्योगिक उत्पादों की मांग, उत्पादन और निवेश में सुस्ती बनी हुई है. कई वैश्विक और घरेलू संस्थाएं चालू वित्तीय वर्ष के लिए जीडीपी की वृद्धि दर के पहले के अनुमानों में डेढ़ से दो फीसदी की कटौती का एलान कर चुकी हैं.

लेकिन अर्थव्यवस्था के मैनेजर ऊंट की तरह रेत में सिर छुपाए तूफान के गुजरने का इंतजार कर रहे हैं. सवाल यह है कि क्या रेत में सिर छुपाकर इंतजार करने से तूफ़ान शांति से गुजर जाएगा?  

Write a comment ...

Anand Pradhan

देश-समाज की राजनीति, अर्थतंत्र और मीडिया का अध्येता और टिप्पणीकार