ग्लासगो में क्लाइड के घाट पर नेताओं की भीड़, इथियोपिया में युद्ध, चीन में शी जिनफिंग, इराक़ और दक्षिण अफ्रीका में चुनाव और अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ती अराजकता के बीच प्रकट भए अखुंदज़ादा: उम्मीद है कहाँ?

उत्तर भारत में हल्की ठण्ड ने दस्तक दे दी है. दीपावली गुजर चुकी है. बैन के बावजूद जमकर पटाखे फोड़े जा चुके हैं. इसके साथ ही लौट आया है- स्माग यानी कोहरे और धूल-धुएं और जहरीली गैसों के मेल से बनी प्रदूषण की चादर जो दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत पर छा गई है. रिपोर्टें बता रही हैं कि दिल्ली की हवा में प्रदूषण की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुँच गई है.

दूसरी ओर, चीन की राजधानी बीजिंग, शंघाई और तियानजिन समेत उत्तरी चीन के कई शहर स्माग की चपेट में है. हालात इतने ख़राब हैं कि सरकार ने शुक्रवार को हाइवे बंद और स्कूलों में आउटडोर गतिविधियों पर रोक लगाने का एलान किया है. रिपोर्टों के मुताबिक, चीन कोयले से चलनेवाले बिजलीघरों से बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए जमकर कोयला फूंक रहा है जिसका नतीजा यह हुआ है कि शहरों में विजिबिलिटी काफी घट गई है और प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ गया है.

संयोग देखिये कि जब एशिया के दो सबसे बड़े विकासशील देश और उनके बड़े शहर स्माग और जहरीले प्रदूषण से परेशान थे, दुनिया की निगाहें ग्लासगो की ओर लगी थीं. बीते सप्ताह स्काटलैंड का यह सबसे बड़ा और खूबसूरत शहर- ग्लासगो दुनिया भर के अखबारों और न्यूज मीडिया की सुर्ख़ियों में छाया रहा.

लेकिन क्या आपको याद है कि पिछली बार आपने कब ग्लासगो का नाम सुना था? मैंने सबसे पहले ग्लासगो का नाम यूनिवर्सिटी में मीडिया/पत्रकारिता की पढ़ाई करते हुए सुना था. सिलेबस में मीडिया सिद्धांतों के बारे में फ्रैंकफर्ट स्कूल के साथ ग्लासगो स्कूल (ग्लासगो यूनिवर्सिटी मीडिया ग्रुप) के बारे में सरसरी तौर पर पढ़ा था. 70 के दशक के उत्तरार्द्ध में ब्रिटेन में ग्लासगो स्कूल की टेलीविजन न्यूज पर क्रिटिकल शोध रिपोर्टों- बैड न्यूज, मोर बैड न्यूज और रियली बैड न्यूज ने खूब हंगामा मचाया था. चैनलों में ग्लासगो स्कूल की क्रिटिकल मीडिया रिपोर्टों का आतंक सा बन गया था क्योंकि शोधकर्ताओं ने टीवी न्यूज के वैचारिक पूर्वाग्रहों, झुकावों और एजेंडा सेटिंग में उनकी भूमिका का खुलासा किया था.

इसके अलावा याद नहीं आता कि कब और किस सिलसिले में आखिरी बार ग्लासगो का जिक्र आया था. वैसे तो स्काटलैंड को सुर्खियाँ कम ही नसीब होती हैं. गाहे-बगाहे उसके ब्रिटेन से पूरी तरह अलग होने की चर्चाएँ उठती रहती हैं. ब्रेक्जिट के समय भी ऐसी रिपोर्टें आईं थीं. लेकिन दिन सबके फिरते हैं. बीता हप्ता स्काटलैंड का था. बहुतेरे भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए स्काटलैंड पिछले कई दिनों से गुणा-गणित का हिस्सा था.

बीते शुक्रवार की रात दुबई में जब भारतीय क्रिकेट टीम ने एकतरफा मुकाबले में स्काटलैंड की टीम को पीटकर अपना रन रेट अफ़ग़ानिस्तान से बेहतर कर लिया तो टी-20 विश्व-कप के सेमीफाइनल में पहुँचने की उसकी डूबती उम्मीदों को तिनके का सहारा मिल गया. यह जानते हुए भी कि आखिरी नतीज़ा क्या होनेवाला है!

लेकिन उम्मीद तो उम्मीद है- भले ही डूबते को तिनके के सहारे की तरह क्यों न हो. क्लाइड नदी के किनारे बसे ग्लासगो में जारी कॉप-26 यानी यूएन क्लाइमेट चेंज कांफ्रेंस से दुनिया को बहुत उम्मीदें थीं और अब भी हैं. असल में, ग्लासगो के घाट पर दुनिया भर के बड़े नेताओं- राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों से लेकर विशेषज्ञों, एनजीओ और क्लाइमेट कार्यकर्ताओं की इतनी भारी भीड़ जुटी कि अगर आप शहर में एक पत्थर भी फेंक देते तो वह शर्तिया किसी न किसी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के सिर पर गिरता जो वहां एक-दूसरे से कंधे रगड़ और गले मिल रहे थे.

क्लाइड किनारे कॉप-26 सम्मलेन स्थल: रौशनी और अँधेरा

अलबत्ता वह पत्थर चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग या रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ब्राजील के बोल्सनारो, ईरान के रईसी या फिर तुर्की के अर्दुआन पर नहीं गिरता क्योंकि उनकी इस जमावड़े और क्लाइमेट चेंज के इस फैशन शो में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. क्लाइमेट चेंज पर उन्हें दिखावटी चिंता दिखाने की जरूरत महसूस नहीं हुई. वे ग्लासगो के मेले को दूर से देखते रहे.

और ग्लासगो से निकला क्या? यहाँ बहुत कन्फ्यूजन है. जितने मुंह, उतनी बातें. मतलब बातें ही बातें हैं. नेताओं ने खूब लच्छेदार भाषण दिए और उनमें शब्दकोष से छांटकर निकाले गए शब्द दिल खोलकर खर्च किए. लेकिन उनसे कोई मतलब निकालना मुश्किल है. उनमें वही बातें थीं जो लोग थोड़े फेरबदल के साथ पिछले 20 साल से सुन रहे हैं जिन्हें सुनकर कोई भी झुंझला जाए.

क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग भी अपनी झुंझलाहट नहीं रोक सकीं. "ब्ला..ब्ला..ब्ला..ब्ला..(Blah..blah..blah..blah..)"- यह थी ग्लासगो में नेताओं के लच्छेदार भाषणों और सालों से क्लाइमेट चेंज पर जारी वार्ताओं के बाद के नतीजों पर ग्रेटा की प्रतिक्रिया. आश्चर्य नहीं कि ग्लासगो की सड़कों पर बीते शुक्रवार को 'फ्राइडे फार फ्यूचर' के बैनर तले हजारों क्लाइमेट कार्यकर्ताओं ने मार्च निकाला. वहां पूर्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति अल गोर ने कहा भी कि, "अभी जीत के एलान का समय नहीं आया है. हमने कुछ प्रगति की है लेकिन जिन लक्ष्यों तक पहुंचना है, उससे अभी बहुत दूर हैं."

और प्रगति क्या हुई है? ग्लासगो से कई साल पहले से नेट जीरो के बहुत चर्चे थे. कॉप-26 से पहले नेट जीरो की हाइप चरम पर पहुँच गई. कहने को ग्लासगो में दुनिया के 192 देशों में से कोई 140 से ज्यादा देशों ने नेट जीरो के लक्ष्य को 2050 तक हासिल करने के लिए संकल्प लिया है. जी हाँ, आपने बिलकुल ठीक सुना. वायुमंडल में कार्बन (CO2) उत्सर्जन के मामले में नेट जीरो के लक्ष्य को पूरा करने की डेडलाइन वर्ष 2050 है.

ग्लासगो में क्लाइमेट जस्टिस मार्च: नेता इन्हें सुन रहे हैं क्या?

इन देशों में वे बड़े और विकसित देश सबसे आगे हैं जो ऐतिहासिक रूप से और आज भी सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं, इन देशों ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ग्लासगो में अपने-अपने देशों के 'राष्ट्रीय स्तर पर निश्चित योगदान' (एनडीसी-NDC) में नए पहलकदमियों का एलान किया है. जाहिर है कि इन खूब बखान भी हो रहा है.

लेकिन यह सब अखबारों और न्यूज मीडिया की सुर्खियाँ हैं जो जाहिर हैं कि कॉप-26 में पहुंचे राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के लच्छेदार भाषणों, आयोजकों और सरकारों की ओर से जारी प्रेस रिलीज से बनी या बनाई गई हैं.

लेकिन सच क्या है? एक तो यह डेडलाइन 2050 की है यानी कोई 29-30 बाद की. ग़ालिब होते तो कहते 'कौन जीता है तेरी जुल्फ़ के सर होने तक' लेकिन ग्लासगो से आ रहे संदेशों से साफ़ है कि दुनिया 2050 के इस तिनके के सहारे ही जीने को तैयार है. वह और कर भी क्या सकती है.

कहने की जरूरत नहीं है कि 2050 तक इसका हिसाब-किताब देने के लिए शायद ही कोई मौजूदा राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बचा होगा. इन 30 वर्षों में एक नई पीढ़ी आ चुकी होगी.

दूसरे, 2050 की डेडलाइन बहुत लचीली है. आश्चर्य नहीं होगा अगर इसे 2035-40 आते-आते एक 'रियलिस्टिक टारगेट' के नामपर आगे बढ़ाकर 2070 कर दिया जाए.

तीसरे, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ठोस योजना, रोडमैप, उसे लागू करने और उसकी मानिटरिंग से लेकर कार्बन उत्सर्जन कम करने और वायुमंडल में मौजूद कार्बन को खपाने के लिए जंगल लगाने और उनका दायरा बढ़ाने, नई ग्रीन टेक्नालाजी आदि के लिए धन मुहैया कराने को लेकर सबसे बड़े प्रदूषक देशों और उनके नेताओं की कथनी-करनी में आसमान और खाई का अंतर बना हुआ है.

बात साफ़ है कि ज्यादातर देश खासकर बड़े अमीर और विकसित देश जो सबसे बड़े प्रदूषक और कार्बन उत्सर्जक भी हैं, वे अपनी विलासिता और अत्यधिक उपभोग आधारित जीवनशैली को त्यागने और अपनी जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं. वे अभी भी जोर-जबरदस्ती, धूर्तता, तिकड़मों, चिकनी-चुपड़ी और घुमावदार बातों से सारी जिम्मेदारी विकासशील और गरीब देशों पर डाल रहे हैं. वे अपनी 'ऐतिहासिक जिम्मेदारी' और 'क्लाइमेट न्याय' के सिद्धांत को ठेंगा दिखाने में लगे हैं.

ग्लासगो भी इसका अपवाद नहीं था.

यह तब है जब ज्यादातर क्लाइमेट चेंज पर काम कर रहे वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यही हाल रहा तो इस सदी के खत्म होने से बहुत पहले ही धरती का तापमान 2.7 डिग्री सेंटीग्रेड तक से ज्यादा बढ़ जाएगा. वह स्थिति एक बड़ी पर्यावरणीय दुर्घटना और प्रलय को निमंत्रण देने के बराबर है. उसकी कीमत हम भी चुका रहे हैं और हमसे ज्यादा हमारी आनेवाली पीढियां चुकाएंगी.

चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं सातवें आसमान पर हैं

लेकिन राजनेता आज और अगले चुनाव और जहाँ चुनाव की जरूरत नहीं है, वहां सत्ता बचाए रखने से आगे कहाँ सोचते हैं. आज की वैश्विक राजनीति और राजनेता भी इसके अपवाद नहीं हैं. चीन को ही लीजिए, जहाँ राष्ट्रपति शी जिन फिंग का सारा फोकस और उर्जा इस बात में लगी हुई है कि कैसे उन्हें नियमों के विपरीत पांच साल का तीसरा कार्यकाल मिल जाए. शी 68 साल के हो गए हैं और उन्हें सत्ता में आये दस साल हो रहे हैं. लेकिन सर्वशक्तिशाली शी ने जिस तरह से सौ साल की हो चुकी कम्युनिस्ट पार्टी को कब्जे में कर लिया है, उसमें पार्टी, उसका आंतरिक लोकतंत्र और उसूल पीछे चले गए हैं और नेता का महिमा-मंडन चरम पर पहुँच गया है. आश्चर्य नहीं होगा अगर इस सोमवार से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महत्वपूर्ण प्लेनम में शी के अगले कार्यकाल का रास्ता साफ़ हो जाए.

उधर दक्षिण अफ्रीका में सत्तारूढ़ अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस (ए.एन.सी) को बीते सप्ताह हुए स्थानीय निकायों (म्युनिसिपल) चुनावों में वोटरों ने तगड़ा झटका दिया है. देश में रंगभेद विरोधी संघर्षों की अगुवाई करनेवाली और नेल्सन मंडेला की पार्टी के मौजूदा नेतृत्व को वोटरों ने नोटिस दे दिया है. इन म्युनिसिपल चुनावों में पार्टी के वोट उसके 1994 में सत्ता में आने के बाद पहली बार 50 फीसदी से नीचे चले गए. पार्टी को 2016 के म्युनिसिपल चुनावों में 54 फीसदी वोट मिले थे लेकिन इस बार सिर्फ 46 फीसदी वोट मिले हैं. वोटरों ने ए.एन.सी को भ्रष्टाचार, स्कैंडलों, सार्वजनिक सेवाओं की ख़राब हालत, बढ़ती बेरोजगारी और गैर-बराबरी के लिए न सिर्फ दण्डित किया है बल्कि देश में 2024 में होनेवाले आमचुनावों में बहुदलीय राजनीति और भविष्य में गठबंधन राजनीति के दरवाजे खोल दिए हैं.

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इसके साथ दक्षिण अफ्रीका में सिर्फ 27 साल में एक पार्टी- ए.एन.सी के एकछत्र राजनीतिक वर्चस्व की ढलान शुरू हो गई है. क्या आपको इसमें कुछ समानताएं याद आ रही हैं? भारत में भी राष्ट्रीय आन्दोलन की पार्टी- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकछत्र राजनीतिक वर्चस्व में गिरावट सिर्फ 20 साल में शुरू हो गई थी जब पहली बार 1967 में पांच राज्यों में विपक्षी गठबंधन की संविद सरकारें बनी थीं. उसके बाद की कहानी तो सब जानते हैं कि कांग्रेस कैसे धीरे-धीरे अपनी जमीन गँवाती गई.

इस बीच, अफ़्रीकी महाद्वीप के इथियोपिया में सरकारी सेना और उसके उत्तरी इलाके- टिग्रे के विद्रोही समूहों खासकर टिग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (टी.पी.एल.एफ) के बीच युद्ध शुरू हुए एक साल होने को आये जिसमें अब तक एक लाख से ज्यादा लोगों के मारे जाने और बड़े पैमाने पर निर्दोष नागरिकों के उत्पीडन, यातना, बलात्कार, उनके मानवाधिकारों के हनन के आरोप दोनों पक्षों पर लग रहे हैं. इस सप्ताह खबर आई कि टिग्रे और देश के अलग-अलग हिस्सों में इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद की सरकार के खिलाफ लड़ रहे 9 विद्रोही समूहों ने अहमद सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए एक समझौते पर दस्तख़त किए हैं. दूसरी ओर, अबी अहमद सरकार ने टिग्रे में विद्रोही समूहों की बढ़त के बाद देश में इमरजेंसी की घोषणा की है.

मजे की बात यह है कि सरकार विरोधी गुटों में यह समझौता वाशिंगटन में हुआ है. यही नहीं, अमेरिका इथियोपिया में युद्ध खत्म कराने में सक्रिय दिलचस्पी ले रहा है. अमेरिका के विशेष दूत जेफ्री फेल्टमैन आदिस अबाबा पहुंचे हुए हैं और अबी अहमद पर तुरंत सीजफायर का दबाव बना रहे हैं.

टिग्रे युद्ध में फंसा इथियोपिया

इथियोपिया में जो कुछ हो रहा है, वह बताता है कि एक बहु-एथनिक देश में अगर विविधताओं का सम्मान नहीं किया गया और विभिन्न एथनिक समूहों को सत्ता में बराबर की भागीदारी नहीं मिली तो उसके नतीजे कितने घातक हो सकते हैं. यह भी कि एकछत्र सत्ता का लोभ देश की एकता के लिए कितना खतरनाक हो सकता है. यह तथ्य गौर करने लायक है कि वर्ष 2018 तक इथियोपिया की राष्ट्रीय गठबंधन की सरकारों में टिग्रे का टीपीएलएफ एक अभिन्न घटक हुआ करता था और आज वह एक विद्रोही समूह है जो केन्द्रीय सरकार के खिलाफ बगावत का झंडा उठाये हुए है.

अफ्रीका में ऐसे न जाने कितने उदाहरण भरे पड़े हैं जो बताते हैं कि राष्ट्र निर्माण एक दिन में नहीं होता और न ही राष्ट्र कोई स्थाई चीज है. इथियोपिया उसका ताज़ा उदाहरण है कि राष्ट्र निर्माण के लिए कितना धैर्य, परिपक्वता, एथनिक-धार्मिक समूहों में आपसी सम्मान, सत्ता और अधिकारों में समुचित भागेदारी और लोकतान्त्रिक परम्पराओं का पालन कितना जरूरी है.

मध्य-पूर्व में इराक़ इसका एक और उदाहरण है जहाँ पिछले महीने हुए संसदीय चुनावों के बाद भी राजनीतिक अस्थिरता, टकराव और खूनी संघर्ष न सिर्फ बना हुआ है बल्कि चुनावों के बाद उनमें इजाफ़ा हुआ है. कई बार लोकतान्त्रिक चुनावों से शांति और स्थिरता के रास्ते खुल जाते हैं लेकिन कई बार चुनाव सामाजिक-राजनीतिक फाल्टलाइंस को और बढ़ा देते हैं और टकराव के नए फ्रंट खुल जाते हैं. यह भी कि अगर समाज में एथनिक-धार्मिक बिखराव और टकराव बने हुए हैं तो चुनावों में भी वही दिखेगा.

लगता है कि इराक़ में यही हो रहा है और पिछले दो दशक से शांति और स्थिरता की राह देख रहे इराक़ी समाज का इंतजार लम्बा होता जा रहा है. अफ़ग़ानिस्तान के हालात भी दिन पर दिन ख़राब ही हो रहे हैं. तालिबान के लिए सत्ता पर कब्ज़ा करना जितना आसान था, सरकार चलाना और आम अफगानियों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करना उतना ही मुश्किल साबित होता दिख रहा है. देश में बंदूक का राज है, चाहे वह बंदूक जिसके हाथ में हो. नतीजा यह कि देश के जिस शहर-क़स्बे, गली और मोहल्ले में तालिबान के जिस गुट और स्थानीय युद्ध सरदार (वार लार्ड) के पास ज्यादा लड़ाके और बंदूकें हैं, वह मनमाने तरीके से राज चला रहा है.

अखुन्दजादा को अब पता लग रहा है युद्ध लड़ने से ज्यादा मुश्किल है सरकार चलाना

देश में खून-ख़राबा जारी है. सड़कों और गलियों में अराजकता है. तालिबान गुटों और उनके नेताओं के बीच आपस में और दूसरी ओर, अफगानिस्तानी आईएस-खोरासान के साथ सत्ता संघर्ष तेज होता जा रहा है. इस सबके बीच, बीते हप्ते तालिबान के रहस्यमय सुप्रीम नेता या अमीर उल मोमिनीन हैब्तुल्लाह अखुन्दज़ादा को गुप्तवास से निकलकर तालिबान के घुस आये घुसपैठियों/बहरूपियों को नतीजे भुगतने की चेतावनी देनी पड़ी. इससे पता चलता है कि तालिबानी राज में स्थानीय लड़ाकों की मनमानियों, वसूली-लूटपाट, फतवों, यातनाओं और अपराधों के ख़िलाफ़ अफ़गानी समाज में नाराजगी बढ़ रही है. यह भी कि तालिबान के सुप्रीम और टाप नेताओं की देश में किस हद तक चल रही है.

और अंत में,

इस हप्ते दुनिया में सब कुछ निराश करनेवाली घटनाएं ही नहीं हुईं. कोविड-19 महामारी के साथ जारी जद्दोजहद में कुछ उम्मीद भरी ख़बरें भी आईं हैं. दो बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों- मर्क और फ़ाइज़र ने कोविड वायरस के खिलाफ प्रभावी एंटी-वायरल टैबलेट बनाने और उसके शुरूआती ट्रायल में अच्छे नतीजों की घोषणा की है. ब्रिटेन ने मर्क के एंटी-वायरल टैबलेट के इमरजेंसी इस्तेमाल की इजाज़त देने का एलान किया है. यह भी कि टीकाकरण में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है. हालाँकि सम्पूर्ण टीकाकरण के लक्ष्य को हासिल करने की राह अभी भी लम्बी और मुश्किल भरी है.

क्योंकि सभी देश न्यूजीलैंड की तरह तो नहीं हैं जहाँ प्रधानमंत्री जसिंदा अडर्ण की सरकार टीकाकरण को देश के आखिरी आदमी खासकर देश के दूर-दराज के इलाकों में आदिवासी माओरी समुदाय तक ले जाने के लिए माफिया गैंग और अपराधी गुटों की मदद लेने से भी हिचकिचा नहीं रही है. मजे की बात है कि अपराधी समूह भी टीकाकरण में सरकार की मदद करने में पीछे नहीं हट रहे हैं. उन्होंने आपसी झगड़े भुलाकर लोगों से वैक्सीन लगवाने की अपील की है. पता नहीं क्यों यह खबर पढ़कर मुझे हिंदी कवि-कहानीकार जयशंकर प्रसाद की कहानी "गुंडा" की याद आ गई.

लेकिन चिंता की बात है कि रूस और कुछ और यूरोपीय देशों में कोविड संक्रमण के मामले फिर तेजी से बढ़ रहे हैं. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में इस महामारी से सरकारों की ओर से कनफर्म्ड 50 लाख लोगों की मौत हो चुकी है. कई शोध एजेंसियों और स्वतंत्र शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस महामारी में 1.7 करोड़ के आसपास लोगों की मौत हो चुकी है.

इस सप्ताह इतना ही, अगले सप्ताह फिर मुलाकात होगी. यह बताना मत भूलियेगा कि दुनिया भर की घटनाओं का यह साप्ताहिक राउंड अप आपको कैसा लगा? इसमें क्या और जोड़ा जा सकता है? क्या छोड़ा जा सकता है? ईमेल है: apradhan28@gmail.com

शुभकामनाएं.

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Anand Pradhan

देश-समाज की राजनीति, अर्थतंत्र और मीडिया का अध्येता और टिप्पणीकार