सबसे बड़ा गर्भनिरोधक है विकास

चीन और खुद भारत उदाहरण है जनसंख्या नियंत्रण की डराने-धमकाने की नीति की विफलता का. भारत में इमरजेंसी के दौरान जबरन नसबंदी और जनसंख्या नियंत्रण की कोशिशें मुंह के बल गिर गईं.  

भारत में जनसंख्या नियंत्रण का वैताल रह-रहकर फिर डाल पर लौट आता है. एक बार यह मुद्दा राजनीतिक सुर्ख़ियों और बहसों में है. असम के नए मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने राज्य में दो बच्चे की नीति पर और कड़ाई बरतने के लिए कुछ अपवादों के साथ उन परिवारों को कई सरकारी सब्सिडी और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करने का भी संकेत दिया है जिनके निश्चित कट-आफ तिथि के बाद दो से अधिक बच्चे होंगे. इससे पहले असम सरकार इस साल जनवरी के बाद से दो से अधिक बच्चों वाले परिवारों को राज्य में सरकारी नौकरी और स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवारी के लिए अयोग्य घोषित करने का फैसला कर चुकी है.

इधर, उत्तरप्रदेश से भी ऐसी खबरें आ रही हैं कि राज्य सरकार जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून लाने पर गंभीरता से विचार कर रही है जिसमें असम की तरह ही दो से अधिक बच्चे पैदा करनेवाले परिवारों को सरकारी नौकरियों, जन-कल्याण योजनाओं और लाभों से वंचित करने का प्रस्ताव है. यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट में भी भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए कड़े उपायों की मांग के साथ एक जनहित याचिका दाखिल कर रखी है.

असल में, देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए कड़े कानून और उपायों की मांग और उसपर तीखी बहसें नई नहीं है. आमतौर पर यह मांग अनुदार दक्षिणपंथी राजनीतिक खेमे की तरफ से उठती रही है. लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के लिए कड़े और दंडात्मक उपायों के समर्थक अधिकांश पार्टियों में रहे हैं. आश्चर्य नहीं कि 90 के दशक से देश में राजस्थान, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, ओड़िशा, मध्यप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक आदि राज्यों में दो बच्चों से अधिक बच्चे पैदा होने पर पंचायत चुनाव में उम्मीदवारी के लिए अयोग्य ठहराए जाने के कानून बनाए गए हैं.

महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश जैसे कुछ राज्यों में दो से अधिक बच्चे होने पर परिवारों को सरकारी नौकरियों से भी वंचित करने के कानून पहले से हैं. इमरजेंसी के दौरान जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर जिस तरह से जबरन नसबंदी और दूसरे डराने-धमकानेवाले और सख्त तौर-तरीके अपनाये गए और वे कितनी बुरी तरह से नाकाम रहे, वह इतिहास भी किसी से छुपा नहीं है.

चीन की नाकामी से सीखिए

लेकिन हैरानी की बात यह है कि देश में जनसंख्या नियंत्रण खासकर दो बच्चों की सीमा के लिए कड़े कानून बनाने और दंडात्मक उपायों की मांग ऐसे समय में उठ रही है जब 80 के दशक से जनसंख्या नियंत्रण के लिए कड़े कानून और दंडात्मक उपायों को लागू करने के लिए कुख्यात रहे चीन में “एक बच्चे (वन चाइल्ड)” नीति के कारण पैदा हुई जनसांख्यिकीय विसंगतियों और समस्याओं ने उसे एक जनसांख्यिकीय आपदा के कगार पर पहुंचा दिया है.

चीन की जनगणना के ताजा आंकड़ों से साफ़ है कि उसकी कड़ी और दंडात्मक जनसंख्या नीति के कारण उसकी आबादी में एक ओर 60 वर्ष से अधिक उम्र के बूढों की संख्या बढ़ रही है और दूसरी ओर, उसकी आबादी में युवा और वर्किंग लोगों की संख्या घट रही है.

नतीजा, चीन सरकार ने हाल ही में “एक बच्चे (वन चाइल्ड)” की अपनी नीति में एक और बड़ा बदलाव करते हुए परिवारों को तीन बच्चे पैदा करने की छूट दी है. इससे पहले चीन ने 2016 में परिवारों को दो बच्चे पैदा की अनुमति दी थी लेकिन इसके बावजूद उसकी जनसंख्या में महिलाओं की कुल फर्टिलिटी रेट में गिरावट और उसके रिप्लेसमेंट रेट से भी नीचे चले जाने के रुझान में कोई फर्क नहीं आया है. जनसंख्या में स्थायित्व के लिए माना जाता है कि महिलाओं की फर्टिलिटी रेट 2.1 रहनी चाहिए जिससे एक परिवार खुद को दोहरा सके और जनसंख्या में वर्किंग युवाओं की संख्या स्थिर हो सके.

लेकिन चीन में 80 के दशक की अदूरदर्शी और अवैज्ञानिक जनसंख्या नीति के कारण उसकी कुल फर्टिलिटी रेट 1970 के 5.8 से घटकर 2015 में 1.6 रह गई जो रिप्लेसमेंट रेट से भी कम है. यही नहीं, उसकी आबादी में 60 साल से अधिक लोगों की तादाद बढ़कर 18.7 फीसदी पहुँच गई है. इसके कारण चीन में न सिर्फ वृद्धों की तादाद बढ़ने से उनकी देखभाल और सामाजिक कल्याण के बजट पर दबाव बढ़ा है बल्कि वर्किंग लोगों की संख्या के घटने से कामगारों की कमी और अर्थव्यवस्था में उपभोग और मांग पर भी नकारात्मक असर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है.

आश्चर्य नहीं कि चीन इस नीति को पिछले पांच साल में दो बार बदलने और पहले दो बच्चे पैदा करने और अब तीन बच्चे पैदा करने की छूट देने का एलान कर चुका है लेकिन कुल फर्टिलिटी रेट 2015 के 1.6 से गिरकर 2020 में 1.3 रह गई है. चीन अब अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन और कई सुविधाएँ देने का एलान भी कर रहा है.

चीन ही नहीं, दुनिया के कई और विकसित देश भी अपने यहाँ महिलाओं की कुल फर्टिलिटी रेट में गिरावट के रुझान और उसके रिप्लेसमेंट रेट से भी नीचे चले जाने के कारण चिंतित है जहाँ बिना किसी दंडात्मक प्रावधानों और कड़े कानूनों के सिर्फ तीव्र विकास, स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा के प्रसार और वर्कफोर्स में महिलाओं की बढ़ी भागीदारी के कारण ऐसा हुआ है.

जनसंख्या वृद्धि रोकनी है तो विकास पर जोर दीजिये

इससे साफ़ है कि विकास से बड़ा कोई गर्भनिरोधक नहीं है. मानवीय विकास सूचकांक में सबसे उपरी पायदान पर खड़े दुनिया के अधिकांश विकसित और अमीर देशों में महिलाओं की कुल फर्टिलिटी रेट 1.2 से लेकर 0.98 तक पहुँच चुकी है जोकि रिप्लेसमेंट रेट से काफी कम है. इसके कारण इन देशों में वृद्धों की संख्या लगातार बढ़ रही है और वर्किंग आबादी घट रही है जो उनकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए कई तरह की परेशानियाँ खड़ी कर रही है. इनमें से कई देश परिवारों को बच्चे पैदा करने के लिए नकद लाभ से लेकर और कई प्रोत्साहन दे रहे हैं.

लगता है कि भारत में जनसंख्या नियंत्रण के कड़े नियमों के पैरोकारों ने चीन से कोई सबक नहीं सीखा है. वे ऐसी बेतुकी मांग तब कर रहे हैं जब देश में बिना किसी कड़े कानून और नियमों के कुल फर्टिलिटी रेट में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है है. देश में 1994 में कुल फर्टिलिटी रेट 3.4 थी जो 2015 में घटकर 2.2 रह गई.

ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, देश के 22 राज्यों में से 19 राज्यों में परिवारों में औसतन दो या उससे कम बच्चे हैं जो रिप्लेसमेंट रेट के करीब है और जो जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए जरूरी है. अन्यथा दो-तीन दशकों में भारत भी खुद को चीन की स्थिति में खड़ा पायेगा.

मजे की बात यह है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए कड़े कानून की इस बेतुकी बहस में भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) यानी देश की आबादी में 65 फीसदी से अधिक युवाओं और वर्किंग आबादी की मौजूदगी की चर्चाएँ भुला दी गईं हैं.

असल में, बहस तो इसपर होनी चाहिए कि डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ लेने के लिए युवाओं को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और गुणवत्तापूर्ण रोजगार देने के लिए क्या किया जा रहा है?                                     

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Anand Pradhan

देश-समाज की राजनीति, अर्थतंत्र और मीडिया का अध्येता और टिप्पणीकार