कोपा कप: आज ब्राजील का नहीं, अर्जेंटीना का दिन था...मुझे बेनेडिक्ट एंडरसन याद आ रहे थे

एक ओर रोमांचक मैच चल रहा था..ब्राजील और अर्जेंटीना कोपा कप जीतने के लिए एक-दूसरे से जूझे पड़े थे..धक्का-मुक्की, फाउल और स्ट्रीट फाइट चरम पर थी..दक्षिण अमेरिकी फ़ुटबाल अपने फुल फ़ार्म में था..दो देश आमने-सामने थे..

मुझे बेनेडिक्ट एंडरसन और उनकी राष्ट्र की अवधारणा- इमेजिंड कम्युनिटीज की याद आ रही थी...राष्ट्रों की अवधारणा जिन प्रतीकों के इर्द-गिर्द गढ़ी गई है, इमेजिन की जाती है, उसमें खेलों की भी बड़ी भूमिका है. दक्षिण अमेरिका के लिए फ़ुटबाल, ईश्वर-धर्म और राष्ट्र से बड़ा नहीं तो उसके बराबर जरूर है जिसमें ब्राजील से लेकर पेरू तक और कोलंबिया से लेकर अर्जेंटीना तक दर्जनों छोटे-बड़े राष्ट्र अपने होने को देखते और महसूस करते हैं. वे अपनी तरह का फ़ुटबाल खेलते हैं जिसमें ड़्रीबलिंग की सुन्दर कलात्मकता है, जबरदस्त प्रतिद्वंद्विता है, आक्रमण है, तेजी है और कुछ भी कर गुजरने का जुनून है.

दक्षिण अमेरिकी देशों ने फ़ुटबाल के जरिये अपने औपनिवेशिक शासकों को चुनौती दी, उन्हें उन्हीं के खेल में पछाड़ा और अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान को जिया है. आश्चर्य नहीं कि दक्षिण अमेरिकी देशों में फ़ुटबाल गली-गली में खेले जानेवाला खेल है जिसमें लोग और समुदाय खुद को और अपने राष्ट्र को इमेजिन करते हैं.

आज भी दो चिर प्रतिद्वंद्वियों का दिन था. एक और बेइंतहा गुस्से के शहर (City of Fury) के रूप में जाने जानेवाले ब्यूनस आयर्स (अर्जेंटीना की राजधानी) और लिएनल मेस्सी की चालाक और कूल टीम थी और दूसरी ओर, ईश्वर के शहर (City of God) यानी रियो-डी-जेनेरियो के अपने मैदान-माकराना में खेल रहे ब्राजील के आक्रामक लड़ाके थे.

दोनों टीमों के बीच की टकराव का इतिहास बहुत पुराना है..उनके बीच होनेवाले मुकाबले बिलकुल गली की लड़ाईवाली फ़ुटबाल के माफिक होती है..

मैच के 90 मिनट में लगभग 70 मिनट ब्राजील हावी रहा, गेंद पर उसका नियंत्रण रहा लेकिन मौके बनाने और मौकों को भुनाने में नाकाम रहने के कारण अपने ही मैदान- मकराना में उसे हार का मुंह देखना पड़ा. ठीक ही कहते हैं कि अंत में जो जीता, वही सिकंदर! आज के दिलचस्प और काटाकाटी के मैच में अर्जेंटीना वही सिकंदर साबित हुआ. उसे 28 साल बाद कोपा कप के साथ जश्न मनाने का मौका मिल ही गया.

स्टार खिलाडी लिएनल मेस्सी के लिए यह एक बड़ा मौका था..वे 16 साल से अर्जेंटीना के लिए खेल रहे हैं लेकिन अर्जेंटीना इस बीच कोई बड़ा टूर्नामेंट नहीं जीत पाया..कोपा कप में 28 साल बाद अर्जेंटीना को जीत मिली है..1937 के बाद पहली बार कोपा फाइनल में अर्जेंटीना ने ब्राजील को हराया है. वह भी उसके अपने गढ़ मराकाना में. याद रखिये कि इस पूरे टूर्नामेंट में ब्राजील के खिलाफ सिर्फ तीन गोल हुए जिसमें आज का वह अकेला और फैसलाकुन गोल भी है जिसे डी मारिया ने 22वें मिनट में किया..

डी मारिया ने 22 वें मिनट में मिले मौके को गंवाया नहीं...और क्या मौका था..रोड्रिगो पॉल ने एक लम्बा पास दिया जिसे डी मारिया ने ब्राजीलियाई लेफ्ट-बैक डिफेंडर रेनन लोदी को छकाते हुए गोलकीपर एडर्सन के ऊपर से गोल में लॉब कर दिया..ब्राजील के खिलाडी कुछ देर के लिए हैरान रह गए..उन्हें समझ में नहीं आया कि यह कैसे हुआ? मुझे लगता है कि रेनेन को लगा कि यह आफ साइड हो जाएगा लेकिन उनका यह मिस-कैलकुलेशन और स्लोपी डिफेंडिंग ब्राजील को भारी पड़ गई..

ब्राजील ने 90 मिनट में कम से कम 70 मिनट खेल में दबदबा बनाकर रखा लेकिन वे मौकों को गोल में नहीं बदल पाए.. आज अर्जेंटीना का दिन था जिसने चालाक फ़ुटबाल खेली..दबाव में खेलने के बावजूद खेल पर उनका नियंत्रण बना रहा. वे अपने डिफेन्स को लेकर आश्वस्त थे. एक गोल से आगे होने के बाद उन्होंने आगे बढ़कर खेलने के बजाय मौके बनाने और गोल को डिफेंड करने की रणनीति पर ज्यादा जोर दिया.

आश्चर्य नहीं कि अर्जेंटीना ने ब्राजील के हाथ से ट्राफी छीन ली..42 साल में यह पहली बार है जब अपने देश में हुए फाइनल में ब्राजील जीत नहीं पाया..अर्जेंटीना की रक्षा पंक्ति ने उन्हें बहुत खतरनाक नहीं होने दिया..गोलकीपर एमी मर्टिनेज़ ने कुछ शानदार मौके बचाए..आज भाग्य भी ब्राजील के साथ नहीं था..ब्राजील की ओर से रिचालिसन ने दूसरे हाफ में एक बार गेंद गोल में डाल दी लेकिन वे कुछ इंचों से आफ साइड हो गए..

अर्जेंटीना की आज की यह जीत एक शानदार ट्रिब्यूट है- मेस्सी जैसे महान खिलाडी के लिए..हालाँकि वे खुद बहुत शानदार मौका बिलकुल गोल के पास पहुंचकर चूक गए..उनका गोल तक पहुंचकर लडखडाना और फिसल जाना और फिर इसपर सिर पर हाथ रखकर मुस्कुराना इस मैच के यादगार पलों में से एक रहेगा.

मेस्सी को खुद गोल न कर पाने का जरूर अफ़सोस होगा..वे इस टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ खिलाडी चुने गए हैं और सबसे ज्यादा गोल करनेवाले खिलाडी भी वे ही बने. इससे पता चलता है कि इस बार कोपा में उनका जादू किस तरह चला लेकिन उन्हें जरूर टीस होगी कि वे फाइनल में गोल नहीं कर पाए...

क्या आज ब्राजील की हार में देश के अन्दर एक दक्षिणपंथी, पापुलिस्ट बोल्सानारो की सरकार की महामारी से निपटने में नाकामी और मौजूदा राजनीतिक अराजकता की भी कोई भूमिका है? याद रहे कि अर्जेंटीना में एक हद तक राजनीतिक स्थायित्व है... अल्बर्टो फर्नांडेज की लेफ्ट लीनिंग सरकार है जिसने मोटे तौर पर महामारी से निपटने में ब्राजील की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर परफार्म किया है. मानिए या नहीं, लेकिन टीमों के मनोबल पर देश की अंदरूनी राजनीति का असर होता है.

मुझे बेनेडिक्ट एंडरसन इसलिए भी याद आ रहे थे.

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Anand Pradhan

देश-समाज की राजनीति, अर्थतंत्र और मीडिया का अध्येता और टिप्पणीकार